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जगदीश चंद्र बोस: वह भारतीय जिसे WiFi की दुनिया भूल गई

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शायद फ़ोन पर। शायद लैपटॉप पर। और शायद WiFi से जुड़कर।

कभी सोचा है कि यह बिना तार की दुनिया शुरू कहाँ से हुई?

बहुत कम लोग जानते हैं कि इस वायरलेस दुनिया की नींव रखने में एक भारतीय वैज्ञानिक का हाथ था। वह भी तब, जब भारत गुलाम था। जब कोलकाता में ढंग के वैज्ञानिक उपकरण भी नहीं मिलते थे।

उस इंसान का नाम था: जगदीश चंद्र बोस।

 

शुरुआत एक अलग तरह के घर से हुई

30 नवंबर 1858 को बंगाल में जन्मे जगदीश चंद्र बोस के पिता एक सरकारी अधिकारी थे।

लेकिन उनके पिता ने एक अलग फैसला किया।

उन्होंने अपने बेटे को अंग्रेज़ी स्कूल नहीं भेजा। पहले स्थानीय बंगाली स्कूल भेजा। उनका मानना था कि बच्चे को पहले अपनी ज़मीन से जुड़ना चाहिए।

यह छोटी सी बात बोस की सोच में हमेशा दिखी। वे पश्चिम से सीखते थे। लेकिन अपनी शर्तों पर।

बाद में उन्होंने कोलकाता के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई की। फिर इंग्लैंड गए। कैम्ब्रिज और लंदन विश्वविद्यालय में विज्ञान पढ़ा। और 1885 में वापस भारत लौट आए।

 

वापसी पर मिला अपमान: जिसे उन्होंने चुपचाप नहीं सहा

भारत लौटने के बाद बोस कोलकाता के Presidency College में भौतिकी के प्राध्यापक बने।

लेकिन यहाँ एक दर्दनाक सच्चाई सामने आई।

ब्रिटिश प्राध्यापकों को जितना वेतन मिलता था, बोस को उससे कम दिया जा रहा था। सिर्फ इसलिए क्योंकि वे भारतीय थे।

बोस ने क्या किया?

उन्होंने वेतन लेने से ही मना कर दिया। तीन साल तक। बिना एक पैसा लिए पढ़ाते रहे।

आखिरकार कॉलेज प्रशासन को झुकना पड़ा। बराबर वेतन मिला। और बकाया भी।

यह सिर्फ पैसों की लड़ाई नहीं थी। यह आत्मसम्मान की लड़ाई थी।

 

उस दौर में दुनिया क्या सोच रही थी?

1800 के दशक के आखिरी सालों में पूरी दुनिया में बिजली और विद्युतचुंबकीय तरंगों को लेकर हलचल थी।

James Clerk Maxwell ने इन तरंगों का सिद्धांत दिया था। Heinrich Hertz ने साबित किया कि ये तरंगें सच में होती हैं।

लेकिन इन्हें असल ज़िंदगी में कैसे काम में लाएँ, यह अभी कोई नहीं जानता था।

बोस ने इसी सवाल को अपना काम बना लिया।

 

1895: वह दिन जो इतिहास बन गया

1894 के आसपास बोस ने रेडियो तरंगों और सूक्ष्म तरंगों पर प्रयोग शुरू किए।

और 1895 में कोलकाता में उन्होंने एक सार्वजनिक प्रदर्शन किया।

बिना किसी तार के। बिना किसी जोड़ के। सिर्फ invisible तरंगों के ज़रिए, उन्होंने एक घंटी बजाई।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने वायरलेस संकेत से बारूद में विस्फोट भी करके दिखाया।

उस समय न WiFi था। न Bluetooth। न आधुनिक रेडियो।

फिर भी एक भारतीय वैज्ञानिक कोलकाता में खड़ा होकर अदृश्य तरंगों से संकेत भेज रहा था।

यह उस दौर के लिए जादू जैसा था।

 

उन्होंने अपने हाथों से उपकरण बनाए

यहाँ एक बात और जाननी ज़रूरी है।

बोस के पास विदेश जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। उस समय भारत में उन्नत वैज्ञानिक उपकरण आसानी से नहीं मिलते थे।

तो उन्होंने क्या किया?

खुद बनाए।

सूक्ष्म तरंग जनित्र। तरंग मार्गदर्शक। रेडियो तरंग खोजक।

उन्होंने मिलीमीटर तरंगों पर भी काम किया, जो आज आधुनिक radar और उपग्रह संचार में काम आती हैं।

जो उपकरण बाज़ार में नहीं मिला, वह उन्होंने अपने हाथों से तराशा।

 

दुनिया ने सुना: लेकिन श्रेय किसे मिला?

धीरे-धीरे बोस का नाम यूरोप तक पहुँचा।

उन्होंने लंदन में अपने प्रयोग पेश किए। यूरोपीय वैज्ञानिक चौंक गए।

उसी दौर में Guglielmo Marconi भी वायरलेस टेलीग्राफी पर काम कर रहे थे।

मारकोनी को बाद में नोबेल पुरस्कार मिला। रेडियो के जनक का खिताब मिला।

बोस को?

कई इतिहासकार आज भी मानते हैं कि बोस के शुरुआती शोध ने वायरलेस विज्ञान की समझ को मज़बूत किया था। लेकिन उन्हें वह पहचान नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी।

 

पैसा नहीं: ज्ञान चाहिए था

आज की दुनिया में कोई भी नई खोज होते ही पेटेंट दाखिल होता है। कंपनी बनती है। पैसा आता है।

बोस की सोच बिल्कुल उलट थी।

उनका मानना था कि विज्ञान किसी एक इंसान की जागीर नहीं है। यह सबका है। इसलिए उन्होंने अपनी कई खोजों का पेटेंट नहीं लिया।

दोस्तों के बहुत कहने पर एक पेटेंट ज़रूर लिया। लेकिन उनका मकसद कभी पैसा कमाना नहीं था।

यह उनकी कमज़ोरी नहीं थी। यह उनकी सोच थी।

 

एक और काम जो लोग नहीं जानते

बोस सिर्फ वायरलेस तरंगों तक नहीं रुके।

उन्होंने पौधों पर भी शोध किया। और दुनिया को बताया कि पौधे भी बाहरी चीज़ों पर प्रतिक्रिया देते हैं।

उन्होंने Crescograph नाम का एक उपकरण बनाया जो पौधों की बेहद छोटी हरकतें माप सकता था।

एक इंसान। दो बिल्कुल अलग विज्ञान। दोनों में कमाल का काम।

 

तो क्या बोस ने WiFi बनाया था?

सीधा जवाब, नहीं।

आज का WiFi कई दशकों की मेहनत और हज़ारों वैज्ञानिकों के काम का नतीजा है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बोस ने जो नींव रखी, उसके बिना यह इमारत खड़ी नहीं होती।

वे पहले थे। उन्होंने रास्ता दिखाया। बाकियों ने उस रास्ते पर चलकर मंज़िल बनाई।

 

आखिरी बात

अगली बार जब आपका फ़ोन WiFi से जुड़े, एक पल रुकिए।

उस कोलकाता के कमरे के बारे में सोचिए जहाँ एक भारतीय वैज्ञानिक बिना किसी सुविधा के, बिना किसी बड़े बजट के, अपने हाथों से उपकरण बनाकर अदृश्य तरंगों को समझने की कोशिश कर रहा था।

न पैसे की चाह। न नाम की भूख। बस एक जिज्ञासा।

जगदीश चंद्र बोस यही थे।

और यही उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाता है।

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