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पाणिनि: जिस भारतीय ने 2500 साल पहले CODING जैसा सोचा

आज जब हम कोडिंग की बात करते हैं तो दिमाग में आता है, कंप्यूटर, इंटरनेट, सिलिकॉन वैली।

लेकिन एक बार रुकिए।

आज से करीब 2500 साल पहले, भारत में एक इंसान ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई थी जो आज के प्रोग्रामिंग लॉजिक से놀랍도록 मिलती-जुलती है।

उस इंसान का नाम था, पाणिनि।

और उन्होंने कोई कंप्यूटर नहीं बनाया। कोई सॉफ्टवेयर नहीं लिखा। उन्होंने बस एक भाषा को इतने व्यवस्थित तरीके से समझाया कि आज के वैज्ञानिक भी दंग रह जाते हैं।

 

पाणिनि कौन थे?

पाणिनि एक संस्कृत विद्वान थे। वे लगभग 5वीं से 4वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुए। यानी आज से करीब 2400 से 2500 साल पहले।

माना जाता है कि वे प्राचीन गांधार क्षेत्र से थे। यह इलाका आज के पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आसपास पड़ता है।

उस ज़माने में संस्कृत सिर्फ एक बोलचाल की भाषा नहीं थी। वह शिक्षा की भाषा थी। धर्म की भाषा थी। दर्शन और साहित्य की भाषा थी।

लेकिन एक बड़ी समस्या थी।

अलग-अलग इलाकों में संस्कृत अलग तरह से बोली जाती थी। उच्चारण बदल जाता था। व्याकरण बदल जाती थी। भाषा बिखरी हुई थी।

पाणिनि ने यह देखा। और उन्होंने तय किया कि इसे व्यवस्थित करना होगा।

 

अष्टाध्यायी: एक किताब जिसने इतिहास बदल दिया

पाणिनि ने एक किताब लिखी, अष्टाध्यायी।

नाम का मतलब सीधा है। अष्ट यानी आठ। अध्यायी यानी अध्याय। आठ अध्यायों की किताब।

लेकिन यह सिर्फ व्याकरण की किताब नहीं थी।

इसमें करीब चार हज़ार सूत्र थे। हर सूत्र एक नियम था। शब्द कैसे बनते हैं। वाक्य कैसे बनते हैं। उच्चारण कैसे होता है। एक शब्द के आगे क्या लगेगा। पीछे क्या लगेगा। कब क्या बदलेगा।

सब कुछ। एक व्यवस्थित तंत्र में।

यह एक पूरा नियम-आधारित ढाँचा था। और यही चीज़ इसे खास बनाती है।

 

सूत्र प्रणाली को समझिए

पाणिनि ने सूत्र शैली का उपयोग किया।

सूत्र का मतलब होता है, छोटा लेकिन एकदम सटीक नियम।

ये सूत्र बहुत छोटे थे। कभी-कभी सिर्फ कुछ शब्दों के। लेकिन उनका मतलब बहुत गहरा था। और एक सूत्र दूसरे से जुड़ा होता था।

यह ठीक वैसा ही है जैसे आज कोडिंग में होता है।

एक लाइन ऑफ कोड। अगली लाइन। और दोनों मिलकर एक काम करते हैं।

पाणिनि के सूत्र भी मिलकर काम करते थे। अकेला सूत्र अधूरा था। सब मिलकर एक पूरा तंत्र बनाते थे।

 

जो बात सबसे ज़्यादा चौंकाती है

आधुनिक प्रोग्रामिंग में एक बुनियादी तरीका है।

इनपुट दो। नियम लागू हो। आउटपुट मिले।

पाणिनि का तंत्र भी ठीक इसी तरह काम करता था।

शब्द का मूल रूप लो। व्याकरण का नियम लगाओ। सही शब्द तैयार।

यह IF-THEN लॉजिक है। अगर यह शर्त है, तो यह होगा। यही आज हर प्रोग्रामिंग भाषा की बुनियाद है।

पाणिनि ने यह 2500 साल पहले किया था। बिना किसी कंप्यूटर के। बिना किसी तकनीक के। सिर्फ अपने दिमाग से।

 

चार बातें जो पाणिनि को आज भी प्रासंगिक बनाती हैं

पहली बात: क्रम का नियम

पाणिनि ने तय किया था कि कौन सा नियम पहले लागू होगा। कौन सा बाद में। यह तरतीब ज़रूरी थी। गलत क्रम से गलत शब्द बनता। यह आज के प्रोग्रामिंग एग्ज़ीक्यूशन ऑर्डर जैसा है।

दूसरी बात: शर्त आधारित नियम

कुछ नियम हर जगह लागू नहीं होते थे। सिर्फ तब लागू होते थे जब कोई खास शर्त पूरी हो। बिल्कुल वैसे जैसे कोड में कंडीशनल स्टेटमेंट होते हैं।

तीसरी बात: नियमों के ऊपर नियम

पाणिनि ने कुछ ऐसे नियम भी बनाए थे जो दूसरे नियमों को कंट्रोल करते थे। कुछ विद्वान इसकी तुलना आज के कंपाइलर सिस्टम से करते हैं।

चौथी बात: कम में ज़्यादा

पाणिनि ने बहुत छोटे संकेतों में बड़ी-बड़ी बातें कह दीं। यह डेटा कम्प्रेशन जैसा था। कम जगह में ज़्यादा जानकारी।

 

दुनिया ने क्या कहा?

20वीं सदी में जब भाषाविज्ञान और कंप्यूटर साइंस साथ-साथ बढ़ने लगे, तो दुनिया के कई विद्वानों की नज़र पाणिनि पर पड़ी।

उन्होंने देखा कि संस्कृत बहुत व्यवस्थित भाषा है। और पाणिनि का नियम तंत्र मशीन प्रोसेसिंग के लिए उपयोगी हो सकता है।

प्रसिद्ध विद्वान Frits Staal ने पाणिनि के काम को मानव बुद्धिमत्ता के सबसे शानदार उदाहरणों में से एक बताया।

आज कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स में, AI लैंग्वेज सिस्टम में, नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग में, पाणिनि का नाम बार-बार आता है।

 

एक ज़रूरी सफाई

इंटरनेट पर अक्सर लिखा मिलता है कि NASA संस्कृत को सबसे अच्छी प्रोग्रामिंग भाषा मानती है।

यह सच नहीं है। इसका कोई पक्का प्रमाण नहीं है।

और यह भी कहना गलत होगा कि पाणिनि ने कोडिंग का आविष्कार किया। या प्राचीन भारत में कंप्यूटर थे।

लेकिन यह ज़रूर सच है, पाणिनि ने भाषा को एक ऐसे तार्किक ढाँचे में रखा जो आज के प्रोग्रामिंग लॉजिक से गहराई से मिलता-जुलता है। और यही उनकी असली महानता है।

सच को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की ज़रूरत नहीं। जो सच है वह खुद काफी बड़ा है।

 

आखिरी बात

जब दुनिया के बाकी हिस्सों में भाषा को बस बोला और सुना जाता था, तब भारत में एक इंसान उसे एक वैज्ञानिक तंत्र की तरह लिख रहा था।

कोई मशीन नहीं। कोई स्क्रीन नहीं। कोई बिजली नहीं।

बस एक तेज़ दिमाग। और एक अद्भुत सोच।

पाणिनि ने साबित किया कि तर्क और व्यवस्था किसी भी युग में, किसी भी भाषा में काम करती है।

आज हम उन्हें व्याकरणाचार्य कहते हैं।

शायद कल की दुनिया उन्हें पहला एल्गोरिदम डिज़ाइनर कहे।

 

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